उत्तराखंड की खूबसूरत नेलांग घाटी में हैं लद्दाख जैसे पहाड़।

लद्दाख का नाम सुनते ही आंखों के सामने बर्फ से ढंके पहाड़ो, घाटियों और सुंदर झीलों की खूबसूरत तस्वीर उभरकर सामने आती है लेकिन एक जगह और है जो लद्दाख जैसी खूबसूरत है। वो भी उत्तराखंड में, जी हां, अगर आप घूमने के शौकीन है और साथ में थोड़ा एडवेंचर भी पसंद करते हैं तो नेलांग घाटी आपके लिए बेस्ट डेस्टिनेशन साबित हो सकती है। नेलांग घाटी उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित है जो बेहद सुंदर और दर्शनीय जगह है। प्राकृतिक सुंदरता से लवरेज इस बेहद खूबसूरत इस घाटी को लंबे समय से पर्यटकों के लिए खोले जाने की मांग की जा रही थी और अंतत 52 साल बाद इसे देशी पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है।

नेलांग घाटी की ऊंचाई समुद्र तट से 11,000 फीट ऊंची है, इस वजह से यहां साल भर बर्फ को देखा जा सकता है। यहां लद्दाख जैसी ख़ूबसूरती है, ऊंची सड़के हैं तो कई ऐतिहासिक महत्व वाले दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। इस घाटी की ख़ूबसूरती का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे देखने और यहां की वादियों का आनंद लेने दूर-दूर से पर्यटक नेलांग पहुंचते हैं। पर्यटकों के मुताबिक नेलांग घाटी बेहद खूबसूरत और आकर्षक ही नहीं काफ़ी रोमांचक भी है।

इस पूरे क्षेत्र में दूर-दूर तक वनस्पति नहीं है। इसे एक तरह से पहाड़ का रेगिस्तान भी कहा जा सकता है। यहां तिब्बत के पठार समेत दशकों पहले तक चलने वाले भारत तिब्बत व्यापार के दुर्गम पैदल पथ भी देखे जा सकते हैं। इस घाटी में गंगा समेत दो नदियां बहती है। गंगा आगे जाकर भैरव घाटी में भागीरथी में मिल जाती हैं। नेलांग से आगे नागा, निलापानी, तिरपानी, पीडीए, सुमला आदि कई स्थान हैं जहां सेना और आईटीबीपी के कैंप बनाए गए हैं जो पूरे वर्ष इलाके की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात रहकर देश की सेवा में तत्पर रहते हैं।

नेलांग घाटी ना सिर्फ़ सुंदर जगह है बल्कि भारत-चीन के बीच बहुत बड़ा व्यापारिक रास्ता हुआ करता था। सन् 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद घाटी को हमेशा के लिए पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया था, लेकिन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगभग 52 साल बाद नेलांग घाटी को पर्यटकों के लिए फिर खोल दिया गया है। वर्तमान में यहां जाने के लिए जिला प्रशासन की अनुमति की जरुरत होती है लेकिन विदेशी पर्यटकों के लिए से इलाका अब भी बंद रखा गया है।

सर्दियों के मौसम यानि नवंबर और दिसंबर में इस जगह पर आने की मनाही है लेकिन मार्च से जून और सितंबर-अक्टूबर का समय यहां आने के लिए उपयुक्त माना जाता है। ध्यान रखें, कि इस क्षेत्र में गाड़ियों को भी एक सीमित मात्रा में आने के लिए इजाज़त मिलती है। यहां आने के बाद पर्यटकों को नेलांग घाटी में बना वुडेन ब्रिज देखने को मिल सकता है। खड़े पठारों पर लोहे की सब्बलों को एक दूसरे से बांधकर उनपर लकड़ी की रेलिंग इस तरह लगाई गई हैं कि देखने वाले दांतों तले ऊगली दबाने पर मजबूर हो जाते है। साथ ही इस पैदल पथ की वास्तुकला देखकर भी पर्यटकों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

इस ब्रिज की ख़ासियत है कि एक समय ये भारत और तिब्बत के बीच व्यापार का केंद्र रहा था। पहाड़ी पेड़ों के अलावा यहां हिम तेंदुआ और हिमालयन ब्लू शीप भी देखने को मिल जाते हैं। यहां किसी भी पर्यटक को रात गुजारने की इजाज़त नहीं है। सन् 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद से इस पूरे इलाके को आम लोगों और पर्यटकों की आवाजाही के लिए पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया था, हालांकि 52 साल बाद इसे देशी पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है लेकिन सुरक्षा कारणों की वजह से विदेशी सैलानियों पर अब भी प्रतिबंध लगा हुआ है। जो भी पर्यटक नेलांग घाटी को देखते हैं उनमें से ज्यादातर के मुताबिक ये तिब्बत का ही प्रतिरूप दिखाई पड़ता है। ज्यादातर पर्यटकों ये मानते हैं कि ये जगह लद्दाख से भी ज्यादा सुंदर और मनोरम है।

नेलांग घाटी में दिखी दुर्लभ प्रजाति की अरगली भेड़, WII ने कैद की तस्वीरें

नेलांग के सुंगला क्षेत्र में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की ओर से लगाए गए कैमरों में अरगली की तस्वीरें कैद हुई हैं। करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर लगाए गए इन कैमरों में अरगली की तस्वीरें ट्रैप होने से डब्ल्यूआईआई और वन विभाग बेहद उत्साहित हैं। अधिकारियों का मानना है कि इन कैमरों की मदद से नेशनल पार्क में और भी दुर्लभ जीवों को ढूंढा जा सकता है।

डब्ल्यूआईआई से एस सत्य कुमार ने बताया कि अरगली जंगली भेड़ की एक प्रजाति है, जो आमतौर पर तिब्बत और कजाकिस्तान के ऊंचे पठारों में पाई जाती है। भारत में लद्दाख में इसे देखा गया है। IUCN की सूची में इस प्रजाति को संकट में बताया गया है। इसका मुख्य कारण वास स्थल, खाने की कमी और अधिक शिकार हो सकता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में इसके दिखने के कारणों पर अभी और शोध किए जाने की जरूरत है।

नेलांग घाटी में अरगली के दिखे जाने पर गंगोत्री नेशनल पार्क के उप निदेशक श्रवण कुमार का कहना है कि वन विभाग और WII की ओर से पार्क क्षेत्र में करीब 35 कैमरे लगाए गए हैं। इस जीव के पार्क में दिखने से स्पष्ट है कि यहां का ईको सिस्टम काफी अच्छा है। यही वजह है कि यहां कई दुर्लभ जीव मिल रहे हैं। विभाग इनकी सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठा रहा है।

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