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“दास्तान चौथे स्तम्भ की”: प्रमोद शाह की वॉल से..

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-अनुपम खत्री, सम्पादक✍️

प्रशासनिक सेवा से जुड़े प्रमोद शाह उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं। इनकी लेखनी समाज के प्रति गहरी सोच को दर्शाती है, जो इनको पुलिसिया पेशे से हटकर एक जागरूक विचारक बनाती है। श्री शाह के लेख सदा ही समाज के संवेदनशील, मार्मिक व नैतिक पहलूओं को दर्शाते हैं। श्री प्रमोद ने facebook wall में इस बार पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, पौराणिक इतिहास पर प्रमोद शाह की वॉल से….

आज जब मीडिया यानी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, जनता के भरोसे पर खरा नहीं उतर रहा हो, मीडिया की विश्वसनीयता का संकट लगातार बढ रहा हो। तब यह यकीन कर पाना कठिन हो जाता है, कि गुलाम भारत में कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले, उत्तराखंड में अभिव्यक्ति का आंदोलन इतने चरम पर था कि, उसने समाज में पुनर्जागरण के आंदोलन को जन्म दिया। दर्जनों स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पैदा किए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में उत्तराखंड के सम्मान को हमेशा उठाए रखा।

सबसे पहली बात 1871 में अल्मोड़ा से प्रकाशित “अल्मोड़ा अखबार” की ही होगी। हालांकि 1868 में “समय विनोद “पहला अखबार प्रकाशित हुआ, लेकिन अल्मोड़ा अखबार ने प्रकाशन के साथ ही सामाजिक सरोकारों से संबंध स्थापित कर लिए।

almora akhbar

1901 में गढ़वाल यूनियन की स्थापना हुई। 1902 में लैन्सडाउन से प्रकाशित “गढ़वाल समाचार” और 1905 में “गढ़वाली” के प्रकाशन ने समाज के विषयों को प्रखरता से उठाना प्रारंभ किया। इन समाचार पत्रों के प्रारंभिक अंको को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि, यह समाचार पत्र हैं अथवा सामाजिक आंदोलन।

garhwali

“अल्मोड़ा अखबार” के संपादक बद्री दत्त पांडे के बनने के साथ ही यह अखबार सामाजिक आंदोलन और कुमायूं परिषद का मुखपत्र बन गया। कुली बेगार, नायक सुधार, वन आंदोलन पर कुमायूं में “अल्मोड़ा अखबार” तो गढ़वाल में “गढ़वाली” और “गढ़वाल समाचार” जनता की आवाज बन गए थे।

1918 में अल्मोड़ा अखबार के संपादकीय में डिप्टी कमिश्नर लोमेश पर जब “लोमेश की भालूशाही” लिखी तो अल्मोड़ा अखबार पर सरकार ने पहरा बैठा दिया। ₹1000 की जमानत मांगी गई, व्यवस्थापक सदानंद सनवाल से त्यागपत्र लिखवा दिया गया। अल्मोड़ा अखबार सरकारी हमले से बंद करना पड़ा।

लेकिन बद्री दत्त पांडे कहां मानने वाले थे, उन्होंने अक्टूबर 1918 में ही “शक्ति” अखबार प्रकाशित किया और अपने पहले अंक में जो हल्ला बोला वह पत्रकारिता की मिसाल है।

वह लिखते हैं..

“उसका उद्देश्य देश की सेवा करना, देशहित की बातों का प्रचार करना, देश में अराजकता और कुराजकता के भाव को न आने देना, प्रजा पक्ष को निर्भीक रूप से प्रतिष्ठा पूर्वक प्रतिपादित करना है। “शक्ति” जन समुदाय की पत्रिका है।

shakti akhbar

यकीन नहीं होता, यह गुलाम भारत की आज़ाद पत्रकारिता थी, जिसमें प्रजा का पक्ष प्रमुख था। समाचार पत्रों ने ही उत्तराखंड में सामाजिक आंदोलन के पुरोधा पैदा किए, उनके नाम भी जानना जरूरी है। उनमें मुख्य हैं- बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत, लक्ष्मी दत्त शास्त्री, गोविंद बल्लभ पंत, तारा दत्त गैरोला, इंद्र लाल शाह, प्रेम बल्लभ पांडे, भोला दत्त पांडे, बैरिस्टर मुकंदी लाल, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा, गिरजा प्रसाद नैथानी, प्रताप सिंह, धनीराम मिश्र, विश्वंभर दत्त चंदोला, मथुरा दत्त नैथानी आदि यह सभी बड़े नाम स्वतंत्रता संग्राम से भी जुड़े रहे और अखबार से भी।

इतनी बड़ी संख्या में सामाजिक सरोकारों से संपन्न व्यक्तियों की समाज में उपस्थिति की कल्पना हम आज भी नहीं कर सकते। यह सरोकारी स्वतंत्र अखबारों का कमाल था।

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