गब्बर सिंह – प्रथम विश्व युद्ध का विक्टोरिया क्रॉस

अपने फर्ज के लिए मर मिटने वाले ऐसे ही लोगों में से गढवाल रायपफल्स के नम्बर १६८५ रायपफलमैन गबर सिंह का नाम सन् १९१४ से इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। मरणोपरान्त ब्रिटिश हुकूमत के सर्वोच्च सैनिक सम्मान ’विक्टोरिया क्रास‘ से सम्मानित गबर सिंह का जन्म टिहरी जिले की वमुन्ड पट्टी में चम्बा के निकट मज्यूड गाँव में १८ अप्रैल सन् १८९५ ई० में एक किसान परिवार में बद्री सिंह नेगी एवं श्रीमती सावित्राी देवी के यहाँ हुआ था। बाल्यवस्था में ही सिर से पिता का साया उठ जाने पर घर-परिवार की जिम्मेदारियों के निर्वाह के लिए इन्होंने प्रताप नगर के राजमहल में नौकरी कर ली। सन् १९१२ में  मात्रा १७ वर्ष की आयु में  इनका विवाह मखलोगी पट्टी के छाती गाँव की सतूरी देवी से हुआ। सन् १९१३ तक इन्होंने प्रताप नगर राजमहल में नौकरी की। प्रथम विश्वयु( की आशंका बढने पर जब अंग्रेजों ने विभिन्न जगहों पर सेना की भर्तियाँ आरम्भ की तो अक्टूबर, १९१३ में लैंसडाउन पहुँच कर गबर सिंह भी गढवाल रायपफल्स की २/३९ बटालियन में राइपफलमैन के रूप में भर्ती हो गये। इन दिनों यु( की विभीषिका में फसे यूरोप में जर्मनी ने ब्रिटिश हुकूमत को झकझोर कर रख दिया था। अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत करने के लिए अंग्रेजों ने स्वशासित क्षेत्राों से यूरोप के मोर्चे के लिए सैनिक टुकडयाँ भेजनी शुरू की। इसी कडी में गढवाल रेजीमेंट की कम्पनियाँ भी रवाना की गई।

जब गढवाल रेजीमेंट की दूसरी बटालियन यूरोप गई तो चन्द्र सिंह गढवाली को भी उनके साथ भेजा गया। गढवाली ब्रिगेड १/२९-२/३९ बी बटालियन को २ सितम्बर, १९१४ को रवाना किया गया। यह सैनिक १३ अक्टूबर, १९१४ को प्रफाँस के बंदरगाह मार्सेल्स  पहुँच कर अपने अपने मोर्चे पर डट गये। यु( के दौरान सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लिली जैसे विशाल शहर के मुख्य द्वार न्यू चैपल के मोर्चे को पफतह करना अंग्रेजों के लिए महत्वपूर्ण था। इस मोर्चे को कब्जाने हेतु रणनीति तैयार करने के लिए सैन्य अध्किारियों ने मंत्राणा करने के बाद गढवाल रायफल्स को सबसे आगे भेजने का निर्णय लिया। १० मार्च, १९१५ की सुबह मुँह अंध्ेरे ही कडकडाती ठंड और कोहरे के बीच अपने बुलन्द हौसले के साथ गढवाली सैनिकों ने आगे बढना शुरू किया। शत्राु पक्ष की भयंकर गोलीबारी के बीच अपने प्राणों की परवाह न कर उसके द्वारा लगाये गये अवरोधें को हटाते हुए गढवाली सैनिक चीते जैसी फर्ती के साथ दुश्मन पर टूट पडे। दुश्मन की भारी गोलाबारी में ३५० सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। इसमें २/३९ गढवाली सैनिक टुकडी का कमाँडर भी मारा गया।  लेकिन गढवाली सैनिकों के आगे बढने का क्रम नहीं रुका जब दोनो पक्षों के सैनिक इतने निकट आ गये कि रायपफल से गोली चलाना असम्भव हो गया तो सैनिक खुखरियाँ और संगीने लेकर शत्राु पर टूट पडे।

गढवाली सैन्य टुकडी का नेतृत्व गबर सिंह ने सँभाल रखा था। इसी बीच गबर सिंह की नजर उस जर्मन सैनिक पर पडी जो अपनी ब्रेनगन से  अंधध्ुन्ध् गोलियाँ बरसा रहा था।  ब्रेनगन की मार से भारतीय सैनिकों  का बच निकलना मुश्किल जान कर गबर सिंह साहस और बहादुरी का परिचय देते हुए कोहनियों के बल जमीन पर रेंगते हुए उस स्थान पर पहुँचे जहाँ से पफायरिंग चल रही थी। गबर सिंह ने फर्ती के साथ ब्रेनगन चला रहे व्यक्ति को दबोच लिया और गन का रूख जर्मन सैनिकों की ओर मोड कर उन पर पफायर खोल दिया। इस अप्रत्याशित हमले में सैकडों जर्मन सैनिक मारे गये। अन्ततः शत्राु की सेना को आत्म समर्पण के लिए मजबूर होना पडा। न्यू चेपल्स के इस यु( में भारतीयों सैनिकों ने भारी मात्राा में राइपफलें और गोली-बारूद जब्त किया। दोनों ओर से हुई जबरदस्ती गोलाबारी में रायपफलमैन गबर सिंह भी बुरी तरह घायल हो गये। यु( में लहुलूहान गढवाल के इस वीर सपूत की अपने पडाव की ओर लौटते हुए मृत्यु हो गई।  न्यू चेपल्स के यु( में असाधरण वीरता, अद्वितीय साहस और पराक्रम के लिए गबर सिंह नेगी को मरणोपरान्त ब्रिटिश सेना का सम्मान ’विक्टोरिया क्रास‘ प्रदान किया गया। यु( की समाप्ति के बाद यह सम्मान दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में तत्कालीन वायसराय द्वारा गबर सिंह की विध्वा पत्नी सतूरी देवी को प्रदान किया गया।

गबर सिंह के जन्म स्थान चम्बा के निकट सन् १९२५ में भारत सरकार ने उनकी याद में स्मारक स्थापित किया। इस अवसर पर कुमाऊँ के कमिश्नर और टिहरी नरेश सहित सैकडों लोग उपस्थित थे। प्रतिवर्ष १२ अप्रैल को यहाँ उनकी स्मृति में एक मेले का आयोजन किया जाता है। जहाँ गढवाल रेजीमेन्ट सेन्टर लैन्सडाउन से एक सैन्य टुकडी आकर इस अमर शहीद को श्र(ांजलि अर्पित करती है।

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