उत्तराखंड में फिर आबाद होंगे वीरान पड़े 986 गांव।

नवगठित ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग की कोशिशें रंग लाई तो पलायन का दंश झेल रहे देवभूमि उत्तराखंड में वीरान पड़े 968 भुतहा गांव (घोस्ट विलेज) फिर से आबाद होंगे। आयोग इसके लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करेगा। प्रयास यह है कि इन गांवों में फिर से बसागत हो अथवा फिर इन्हें पर्यटन ग्रामों के तौर पर विकसित किया जाए। इसके अलावा अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जाएगा।

प्रदेश में पलायन एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है। ज्ञानार्जन, तीर्थाटन के लिए तो पलायन समझ में आता है, लेकिन यहां तो जिसने एक बार गांव को अलविदा कहा दोबारा वहां की तरफ रुख नहीं किया। इन वीरान इन गांवों में कभी खूब चहल-पहल रहा करती थी, मगर अब वहां के घर, गोशालाएं सब खंडहर में तब्दील होने लगे हैं। इसीलिए इन्हें घोस्ट विलेज कहा जाने लगा है। यही नहीं, दो हजार के लगभग ऐसे गांव हैं, जो खाली तो हो चुके हैं, लेकिन गर्मियों में अथवा ग्राम देवता की पूजा आदि के मौके पर कुछ घरों के दरवाजे जरूर खुल जाते हैं।

नवगठित ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग भी इस स्थिति से खासा चिंतित है। आयोग के उपाध्यक्ष डॉ.एसएस नेगी के मुताबिक घोस्ट विलेज, उन गांवों को कहा गया है, जहां अब कोई रहता नहीं है। यूं कहें कि इन गांवों में ऐसी स्थिति नहीं है कि कोई वहां रह सके। ऐसे गांवों को फिर से आबाद करना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन आयोग सभी पहलुओं की पड़ताल करने के बाद इसके लिए ठोस कार्ययोजना तैयार कर सरकार को सौंपेगा।

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