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हिन्‍दी न तो तुम ठहरी हो और न ही ठहर सकती हो |

हिन्दी तुम में कुछ बात है, कुछ तो खास है, कोई तो जादू है तुम में. तुम्हें देखकर लगता है कि हम अपने परिवार में जा मिलें. तुम्हारी कुछ खास बातें, बुनावट और बनावट है जो औरों से अलग करती है.

यूं तो तुमने समय-समय पर अपनी काया बदली है, फिर भी पहचान ली जाती हो. तुमने हिन्दलवी, हिन्दुस्तानी से अपनी यात्रा शुरू कर न जाने किन किन मोड़ों, मुहानों को पार किया है. विकास की इस यात्रा में तुमने बहुत से रंग रूप बदले हैं. कभी तुम आदिकाल में गई तो वहां की छवि ओढ़ ली. जब तुम भक्तिकाल में आई तो कबीर, रहीम, दादुदयाल, रैदास, तुलसी, सूर को अपनाया. उनकी रचनाओं में सजाया संवारा.

जब तुम रीतिकाल में आई तो रीति बद्ध और रीति सिद्ध में ढल गई. आगे बढ़ी तो तुम्हें छायावाद ने गले लगाया, लेकिन तुम वहां भी नहीं रुकी. तुम पर आरोप भी लगे कि तुम रहस्‍यवादी हो गई हो, स्वच्छंदतावादी हो गई हो, लेकिन तुम्हें नहीं रुकना था सो नहीं रुकी.

तुमने प्रगतिवादी, प्रयोगवादी, उत्तर आधुनिक काल तक की यात्रा पूरी की है. अब तो जिस प्रकार की रचनाएं तुम में पनाह लेती हैं उन्हें तो देख, सुन और पढ़कर हैरानी होती है कि इन्हें हम गद्य के रूप में पढ़ें या पद्य के रूप में.

अच्छा ही हुआ हिन्दी तुमने ठहरना नहीं सीखा. न तो तुम ठहरी हो और न ही ठहर सकती हो. लेकिन बीच-बीच में तुम्हें जब सीधा पल्ला और उल्टा पल्ला लिए देखता हूं तो थोड़ी परेशानी होती है. क्योंकि तुम्हारी प्रकृति औरों सी नहीं है. सुना है जो नहीं बदलता, जो नहीं बहता वह मर सा जाता है, और देखने-सुनने में आया है कि भारत में ही पिछले पचास सालों में हजार से भी ज्यादा भाषाएं मर गई हैं. उन्हें अब कोई न बोलने वाला बचा और न समझने वाला.

 

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