आज देवभूमि में सुबह देवधुन से नहीं अजान से हो रही है – कवीन्द्र इष्टवाल।

कल कोटद्वार में लोगों की जागरूकता देखकर अच्छा लगा। कुछ लोग इस गंभीर स्थिति को समझ रहे हैं। दुःख की बात है की कोटद्वार में इनको संरक्षण गढ़वाली भाइयों ने ही दिया था। आज पहाड़ों में हमें हर बड़े शहर में सुबह देव धुनें नहीं उठाती बल्कि अजान उठाती है।

आज फिर लैंसडौन जहरीखाल की खबर, सतपुली, श्रीनगर, कीर्तिनगर, चम्बा, पौड़ी, कोटद्वार के बाद अब लैंसडौन। हम शहर गिनते जा रहे हैं, एक संप्रदाय पहाड़ों की शांत वादियों में जहर घोलता जा रहा है। अरब के पैसो से मस्जिदें बनती जा रही है। इनका सम्बन्ध सीधे बाहरी मुस्लिमों से हैं। हमारे पूर्वजों ने कभी कही लूटपाट नहीं की न ही साम्राज्य विस्तार के लिए किसी राज्य पर आक्रमण किया। समस्त संसार में गढ़वालियों को एक अलग नजरिये से देखा जाता है। सरल ह्रदय और आतिथ्य हमारे खून में है। अक्सर हमारे सीधे पैन को हमारी कमजोरी समझा जाता है।

साथियों इन लोगों को यह पता नहीं है की हम गढ़वालियों का एक और पहलु भी है। हमें कमजोर समझने वाले इस बात का ध्यान रखें की। मुग़ल हमें कभी परास्त नहीं कर पाए। हमने ही मुगलों के नाक – कान काटे हैं। अंग्रेजों को अफगान युद्ध में हमने ही विजेता बनाया। विश्व युद्ध में जर्मन सैनिकों को फ़्रांस में हराने वाले हम ही थे। मेसोपोटामिया और मिडिल ईस्ट के युद्धों में गढ़वालियों की ही तूती बोलती थी। तिब्बत के साथ सीमा का निर्धारण करने वाले भी हम ही थे। निहत्ते पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर अंग्रेज सरकार की जमीन हिलाने वाले भी गढ़वाली ही थे। आजाद हिन्द फौज में भर्ती सर्वाधिक गढ़वाली ही थे। इसलिए हमें न उकसाया जाय, यह एक जिम्मेदार और बहादुर जाती है इसके सब्र का इन्तेहाम न लिया जाय।




कोटद्वार में लोगों से मिलकर और आपके फेसबुक में विचार देखकर मैंने पाया की जनता जागरूक हो रही है। जन आंदोलन पहाड़ों की स्थिति को बदल सकता है। आपका यही ब्यवहार नेताओं की प्राथमिकता बदल सकता है। अगर हिन्दू एक रहा तो सभी नेता कर्मकांड करते नजर आएंगे। हमें देवभूमि को बचाना है। हमारा विचार हर छोटे बड़े शहर में जनजागरण कर लोगों को आने वाली समस्या के बारे में सजक करना है जिसमे आप सभी लोगों की सहभागिता जरूरी है।

जय देवभूमि। जय बाबा केदार। जय बद्री विशाल। जय माँ दीवा भगवती।

 

साभार – कवीन्द्र इष्टवाल की फेसबुक वाल से।

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