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Aap कार्यकर्ताओं को 1 झटका,,बढ़ती मंगाई पर प्रदर्शन किया तो मिला मुकदमा : Arrest

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Live Uttarakhand Desk || Aap के लिए सरकार का ख़ास 

देहरादून। यूँ सत्ता और विपक्ष के अपने 2 रोल तय हैं। सत्ता का काम है अपनी हर गलती को भी खूबी बताना अपने किये कामों का बढ़चढ़ कर बखान करना। वहीं विपक्ष की भूमिका में सत्ता के कामों की कमी निकाल उनका विरोध और प्रदर्शन करना।

ये सिलसिला आज़ाद भारत के समय से चलता चला आ रहा है। लोकतंत्र में इसकी व्यवस्था और गुंजाइश दोनों ही मिलती है परंतु वर्तमान समय मे जैसे राजनीति कुछ या कहें कुछ से ज्यादा बदल गई है। ऐसा क्यों कह रहें हैं वो भी समझिए..

मामला सरकार के खिलाफ Aap के प्रदर्शन का

दरसल मामला जो सामने आया वो कुछ यूँ है कि बढ़ती महंगाई पर सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन करने पहुंचे Aap पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता व कैंट विस् प्रभारी और अन्य कार्यकर्ताओं से जुड़ा है।

देहरादून स्तिथ गांधी पार्क के सामने बढ़ती महंगाई और पेट्रोल डीजल के दामों में हुई बेतहाशा वृद्धि पर Aap पार्टी ने सरकार का पुतला जलाया और नारेबाजी की जैसा हर विपक्ष करता है। इस विरोध को राजधानी की मीडिया ने भी अपने प्रकाशन में खूब जगह दी।

प्रदर्शन के बाद Aap कार्यकर्ताओं पर मुकदमा दर्ज

प्रदर्शन शांत था और सोशल डिस्टेंसी का ध्यान रखा गया था इसकी गवाही तो कैमरे भी देते हैं पर इसके बाद पता चला कि Aap पार्टी के लोगो पर मुकदमे लिख दिए गए हैं। भई अब ये सत्ता है कुछ भी लिख या लिखवा सकती है पर ये मुकदमा क्यों हुआ?

प्रदर्शन से पहले ही प्रशासन को सूचना दीगई थी- रविन्द्र आनंद

Aap Permission Letter

Aap के प्रदेश प्रवक्ता रविन्द्र आनंद ने ये खुलासा किया कि उन्होंने प्रदर्शन से पहले सिटी मजिस्ट्रेट को लिखित में सूचना दी थी और प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी। जिसके बाद एसपी सिटी व एसपी ट्रैफिक को भी विस्तार से सूचित कर दिया गया था।

Aap से पहले कांग्रेसियों पर भी हो चुका मुकदमा

लंबे अरसे विपक्ष में रह कर विरोध प्रदशनों की सबसे एक्सपर्ट पार्टी bjp की कार्यशैली को देखकर लगता है जैसे उसको अपना विरोध बर्दाश्त नहीं खासकर पहाड़ी राजा रावत (TSR & Team) को तो शायद विरोध कतई गवारा नहीं!!

Aap से पहले कांग्रेसी भी मंहगाई और पेट्रोल डीजल के बढ़ते रेटों के खिलाफ प्रदर्शन करने निकले तो उनको भी केस की रेस में लपेट डाला।

कुछ एक पत्रकार सूबे में ऐसे हैं जिन्होंने सरकारी कामों या कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए तो उनको भी केस की फांस चुभो दी जाती हैं। क्या यही सुशासन है? सवाल खड़ा होता है आखिर जब परमिशन की कोशिश आप की तरफ से की गई थी तो क्यों उसी समय उनको प्रदर्शन करने से मना नहीं किया गया? दूसरा यदि लोकतंत्र है तो क्यों विपक्ष की आवाज़ को क़ानूनी फंदों में फसाया जा रहा है?

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