आदि वीरशैवों का वैराग्यपीठ उखीमठ।

आदि गुरु शंकराचार्य से पहले भारत में कई मत थे। जैसे शैव, वैष्णव, शाक्य, गाणपत्य। इनके अंतर्गत भी कई मत थे जैसे कालमुख शैव, कापालिक शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव इत्यादि। शंकराचार्य जी ने सभी मतों को एक किया। इन मतों में शंकराचार्य जी ने वीरशैवों के पूजा पद्दति को नहीं बदला या वीरशैवों ने अपना अलग मत बनाये रखा। प्राचीन शैवों में वीरशैव मत ही आज बचा हुआ है जिसकी सर्वाधिक जनसँख्या आज कर्नाटक में हैं। इनके पांच मठ हैं जिनमे एक मठ वैराग्यपीठ उखीमठ है। उत्तराखंड में वीरशैवों के वंसज सिर्फ उखीमठ में ही हैं जिन्होंने ब्राह्मणो और क्षत्रियों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये हैं। वैराग्यपीठ पूजा का अधिकार सिर्फ वीरशैवों को है जिनमे उनका जंघम कुल का होना अनिवार्य है ( जंघम कुल – पंचमुखी शिव से पांच गुरुओं का अवतरण उनके बाद शिव जंघा से उत्पन्न जंघम कहलाये )

ऋषि अगस्त्य ने भी शिवाचार्य रेणुकाचार्य से लिंग दीक्षा ली थी एवं शंकराचार्य भी अपने अंतिम समय वीरशैव शिवाचार्य के सानिध्य में रहे थे। उत्तराखंड के इतिहास में वीरशैवों के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। पांडव वंशीय जन्मेजय ने उखीमठ शिवाचार्य को इस क्षेत्र के १००८ गांव दान में दिए थे। ये गाँव रावल (शिवाचार्य ) के अधिकार में आते थे। टेहरी के राजा का राज्याभिषेक भी उखीमठ के शिवाचार्य करते हैं।

वीरशैवों के प्रमुख ग्रन्थ श्रीकर भाष्य एवं सिद्धांत शिखामणि हैं। इनके अलावा शैवागमों को ही वीरशैवों में अधिक मान्यता दी गयी है। वीरशैव लिंग धारण करते हैं। वैराग्यपीठ की वीरशैव परंपरा शंकराचार्य व नम्बूदरी पाद से सदियों पुरानी परंपरा है। वैराग्यपीठ उखीमठ के अंतर्गत केदारनाथ मध्यमहेश्वर विश्वनाथ के प्रमुख मंदिर भी आते हैं एवं इन मंदिरों में पूजा भी वीरशैव जंगम करते हैं।

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